Savitribai Phule Birth Anniversary: आज है देश की पहली महिला शिक्षिका का जन्मदिन जाने उनके बारे में रोचक तथ्य

Savitribai Phule Birth Anniversary: 3 जनवरी को पूरे भारतवर्ष में ज्योति बाई फुले जयंती मनाई जाती है। ज्योतिबाई फुले एक समाज सेविका और दार्शनिक थी इन्हें देश की पहली महिला शिक्षिका भी माना जाता है। इन्होंने महिलाओं के अधिकारों तथा उनके सामाजिक विकास के लिए कई सराहनीय कार्य किए हैं। ज्योति बाई फुले का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था। इन्होंने अपने पति के साथ मिलकर कई सामाजिक कुरीतियों को दूर किया तथा देश का पहला महिला स्कूल खोला था।

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उनके इन्हीं सराहनीय कार्य को सम्मान देने के लिए 3 जनवरी को उनका जन्मदिन मनाया जाता है। ज्योति बाई फुले को समाजसेविका नारी मुक्ति आंदोलन में हिस्सा लेने वाली और महिलाओं के लिए लंबी-लंबी लड़ाइयां लड़ने और उनकी स्थिति में सुधार करने के लिए जाना जाता है।

अपार संघर्षों के बाद बनी देश की पहली अध्यापिका

सावित्रीबाई फुले का जन्म उस समय हुआ था जब महिलाओं को शिक्षा का अधिकार प्राप्त नहीं था। इतना ही नहीं सावित्रीबाई फुले एक दलित परिवार से थी और उस समय दलितों को भी शिक्षा का अधिकार नहीं था। परंतु ज्योति बाई फुले ने सभी तरह की सामाजिक कुरीतियों से लड़कर अपनी पढ़ाई जारी रखी। अपनी जाति के वजह से उन्हें छुआछूत का भी सामना करना पड़ा लेकिन वह इन सब चीजों से हार नहीं मानी और अपनी शिक्षा जारी रखी। इसके बाद उन्होंने अहमदनगर और पुणे में अध्यापक बनने की ट्रेनिंग की और बाद में अध्यापिका बनी।

पति ने किया भरपूर सहयोग

सावित्रीबाई फुले का विवाह काफी कम उम्र में हो गया था। सावित्रीबाई फुले की उम्र विवाह के वक्त केवल 9 वर्ष की थी। उनका विवाह ज्योतिबा फुले के साथ हुआ जिनकी आयु 13 वर्ष थी। उनके पति ने उनके पढ़ाई लिखाई में पूर्ण सहयोग किया। शिक्षिका की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद पति के साथ मिलकर 1848 में पहली महिला स्कूल खोला। इसके बाद उन्होंने देशभर में कई अन्य महिला स्कूल भी खोलने में मदद की। इतना ही नहीं उनके इस कार्य के लिए उन्हें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी सम्मानित किया था।

सती प्रथा का किया था विरोध

सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योति बाई फुले के साथ मिलकर कई आंदोलनों में भाग लिया। इन्होंने सती प्रथा का काफी जोरों शोरों से विरोध किया था विधवा होने पर महिलाओं का मुंडन किया जाता था जिसके खिलाफ उन्होंने नाइयों के खिलाफ आंदोलन किया था। सावित्रीबाई ने अपने घर का कुआं दलितों के लिए खोला। इन्होंने विधवाओं के लिए भी आश्रम खुलवाएं। उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर सत्यशोधक समाज की स्थापना की ‌ जिसमें बिना पुजारी और दहेज के विवाह आयोजित किए जाते थे।

जिस समय भारत में जाति प्रथा चरम पर थीं, तब साबित्रीबाई फूले ने अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए। सावित्रीबाई ने अपने पति के साथ मिलकर ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की। यह बिना पुजारी ओर दहेज के शादी का आयोजन करता था। 1897 में पुणे में प्लेग फैल गया था जिसके कारण 66 साल की उम्र में सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया। उन्होंने 10 मार्च 1897 को दुनिया को अलविदा कहा था। 

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प्लेग के कारण हो गई थी मृत्यु

पुणे में फ्लैग फैला तो सावित्रीबाई मरीजों की सेवा में जुट गई। इसी बीच 1897 में उन्हें भी फ्लैग हो गया और इस कारण उनकी भी मृत्यु हो गई। उनके पति ज्योति राव का निधन उनसे पहले 1890 में हो चुका था। अपने पति का अंतिम संस्कार ज्योति बाई फूले ने ही किया था।

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