नारका चतुर्दशी 2023 या छोटी दीवाली: उत्सव की रोशनी में छिपा इतिहास और महत्व

भारतीय संस्कृति में दीपावली का त्योहार अपनी चमक और उत्साह के लिए प्रसिद्ध है। इस उत्सव की शुरुआत ‘नारका चतुर्दशी’ या ‘छोटी दीवाली’ के साथ होती है, जो कि दीपावली से ठीक एक दिन पहले मनाई जाती है। इस दिन का महत्व और इतिहास समृद्ध परंपराओं और कथाओं में निहित है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, नारका चतुर्दशी का दिन नरकासुर के वध की याद में मनाया जाता है। नरकासुर एक दैत्य था, जिसने कई देवताओं और साधुओं को परेशान किया था। उसने सोलह हज़ार कन्याओं को भी बंदी बना लिया था। इसी कारण भगवान कृष्ण ने उनका वध कर दिया था और उन सभी कन्याओं को मुक्त कराया। इस दिन को अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में मनाया जाता है।

इस दिन, लोग अपने घरों को दीयों और रंगोली से सजाते हैं, और सुबह स्नान कर नए वस्त्र पहनते हैं। नारका चतुर्दशी की रात को लोग पटाखे जलाकर और मिठाइयाँ बाँटकर इस उत्सव को मनाते हैं। यह पर्व न केवल खुशियों का प्रतीक है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाता है कि बुराई का अंत अनिवार्य है और सदगुणों की सदा विजय होती है।

इस तरह, नारका चतुर्दशी या छोटी दीवाली न केवल दीपों का त्योहार है, बल्कि यह आत्म-साक्षात्कार और अध्यात्मिक जागृति का भी संदेश देता है। यह हमें आशा और उजाले की ओर ले जाता है, और हमारे जीवन में प्रकाश का संचार करता है।

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